(Mahatma Gandhi Biography) महात्मा गांधी की जीवनी: जन्म, शिक्षा, बाल विवाह,आंदोलन और तथ्य….

Table of Contents

महात्मा गांधी की जीवनी  (Biography of Mahatma Gandhi)

महात्मा गांधी की जीवनी  जानना हर भारतीय के लिए जरूरी है। यह लेख उन छात्रों, इतिहास प्रेमियों और आम लोगों के लिए है जो बापू के संपूर्ण जीवन को समझना चाहते हैं।

गांधी जी सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे – वे एक पूरे युग के नेता थे जिन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह से दुनिया को बदल दिया। उनकी जीवन कहानी में कई अनजाने पहलू हैं जो आपको हैरान कर देंगे। इस लेख में आप जानेंगे कि कैसे गुजरात के एक साधारण परिवार का लड़का दुनिया का महानायक बना। हम बात करेंगे उनकी शैक्षिक यात्रा की, जिसमें लंदन में वकालत की पढ़ाई और शुरुआती संघर्ष शामिल हैं। साथ ही देखेंगे कि दक्षिण अफ्रीका के अनुभवों ने कैसे उन्हें एक मजबूत नेता बनाया, और भारत में उनके ऐतिहासिक आंदोलनों ने कैसे अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया।

गांधी जी का प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

जन्म, बचपन और पोरबंदर का प्रभाव

मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर शहर में हुआ था। पोरबंदर एक छोटा सा तटीय शहर था जो अपनी समृद्ध व्यापारिक परंपरा और धार्मिक सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ का वातावरण विभिन्न धर्मों और जातियों के लोगों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का था, जिसका गहरा प्रभाव बालक मोहन के मन पर पड़ा।

बचपन में गांधी जी एक अत्यंत शर्मीली और डरपोक प्रकृति के बच्चे थे। स्कूल से घर आकर वे तुरंत अपनी पुस्तकों में खो जाते थे क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं कोई उनसे बात न करने लगे। पोरबंदर के मंदिरों और धार्मिक उत्सवों का माहौल उनके बाल मन पर गहरा असर छोड़ता था। यहाँ की जैन परंपरा और अहिंसा की भावना ने उनके व्यक्तित्व की नींव रखी।

पिता करमचंद गांधी और माता पुतलीबाई का व्यक्तित्व

करमचंद गांधी, जिन्हें ‘कावा गांधी’ के नाम से जाना जाता था, पोरबंदर रियासत के दीवान थे। वे एक कुशल प्रशासक, न्यायप्रिय और सिद्धांतवादी व्यक्ति थे। उनमें राजनीतिक सूझ-बूझ थी लेकिन औपचारिक शिक्षा बहुत कम थी। करमचंद जी का व्यक्तित्व सादगी, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से भरपूर था। वे अपने काम के प्रति इतने समर्पित थे कि घर पर कम ही समय बिता पाते थे।

पुतलीबाई गांधी एक अत्यंत धार्मिक और संस्कारी महिला थीं। वे प्रणामी संप्रदाय की अनुयायी थीं और नियमित रूप से व्रत, उपवास और पूजा-पाठ करती थीं। उनका जीवन अनुशासन, त्याग और सेवा भाव से भरपूर था। पुतलीबाई का स्वभाव अत्यंत मृदु और करुणामय था, जिसका प्रभाव गांधी जी के व्यक्तित्व पर जीवन भर दिखाई दिया। माता की धार्मिकता और नैतिक मूल्यों ने गांधी जी के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भाई-बहनों के साथ पारिवारिक रिश्ते

गांधी जी अपने माता-पिता की सबसे छोटी संतान थे। उनके तीन भाई-बहन थे:

  • लक्ष्मीदास गांधी (सबसे बड़े भाई)
  • कर्षनदास गांधी
  • रलियत बहन

परिवार में गांधी जी को विशेष स्नेह मिलता था क्योंकि वे सबसे छोटे थे। बड़े भाई लक्ष्मीदास से उनका विशेष लगाव था, जो बाद में उनके राजनीतिक सफर में भी साथ रहा। भाइयों के बीच प्रेम और सहयोग का रिश्ता था, हालांकि कभी-कभार छोटी-मोटी नोंक-झोंक भी होती रहती थी।

गांधी जी के पारिवारिक माहौल में एकता, सहयोग और पारस्परिक सम्मान की भावना थी। यह संस्कार उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा बना और बाद में उन्होंने इसी भावना को राष्ट्रीय एकता के लिए उपयोग किया।

बाल विवाह और कस्तूरबा से मिलन

महात्मा गांधी
महात्मा गांधी की जीवनी

तेरह वर्ष की आयु में गांधी जी का विवाह कस्तूरबा मखनजी कपाड़िया से हुआ था, जो उनसे कुछ महीने बड़ी थीं। यह विवाह तत्कालीन सामाजिक परंपरा के अनुसार बाल विवाह था।

कस्तूरबा, जिन्हें प्यार से ‘बा’ कहा जाता था, भी पोरबंदर की ही रहने वाली थीं। प्रारंभ में यह रिश्ता एक सामान्य बाल विवाह की तरह था, लेकिन धीरे-धीरे दोनों के बीच गहरा प्रेम और समझ विकसित हुई। कस्तूरबा एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला थीं और उन्होंने गांधी जी के जीवन संघर्षों में हमेशा साथ दिया। गांधी जी ने बाद में स्वीकार किया कि बाल विवाह की परंपरा गलत थी और इसका उन पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा था। फिर भी कस्तूरबा के साथ उनका रिश्ता जीवन भर मजबूत रहा और वे उनकी सबसे बड़ी सहयोगी और प्रेरणा स्रोत बनीं।

प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की चुनौतियां

गांधी जी की शुरुआती शिक्षा का सफर आसान नहीं था। पोरबंदर में जन्म के बाद उनका बचपन राजकोट में बीता, जहां उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा शुरू की। स्कूल में गांधी जी एक औसत छात्र थे और पढ़ाई में विशेष रुचि नहीं दिखाते थे। गणित और भूगोल जैसे विषयों में उन्हें काफी कठिनाई होती थी।

राजकोट हाई स्कूल में दाखिला लेने के बाद स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई। अंग्रेजी भाषा उनके लिए सबसे बड़ी बाधा थी। वे अक्सर कक्षा में शर्माते थे और शिक्षकों से सवाल पूछने में झिझकते थे। दोस्तों के साथ घुलना-मिलना भी उनके लिए मुश्किल था।

घर की माली हालत भी शिक्षा में बाधक बनी। पिता करमचंद गांधी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, जिससे पुस्तकों और अन्य शैक्षिक सामग्री की व्यवस्था करना कठिन था। फिर भी मां पुतलीबाई की प्रेरणा से वे पढ़ाई जारी रखे।

लंदन में कानूनी अध्ययन और जीवनशैली में परिवर्तन

1888 में मात्र 19 साल की उम्र में गांधी जी लंदन गए। यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। लंदन पहुंचने पर उन्हें सबसे पहले खान-पान की समस्या का सामना करना पड़ा। मां से मांस न खाने की शपथ ली थी, लेकिन लंदन में शाकाहारी भोजन मिलना आसान नहीं था।

इनर टेम्पल में दाखिला लेकर उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की। शुरुआत में भाषा की समस्या थी, लेकिन धीरे-धीरे अंग्रेजी में सुधार हुआ। लंदन की संस्कृति से तालमेल बिठाना चुनौतीपूर्ण था – पश्चिमी कपड़े पहनना, डांसिंग सीखना, और अंग्रेजी शिष्टाचार अपनाना।

वेजिटेरियन सोसायटी से जुड़ने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा। यहां उन्होंने भाषण देना सीखा और अपने विचार व्यक्त करने की कला विकसित की। धार्मिक और दर्शनिक पुस्तकों का अध्ययन करके उन्होंने अपने जीवन दर्शन की नींव रखी।

बैरिस्टर बनने की संघर्ष यात्रा

तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद 1891 में महात्मा गांधी जी ने बैरिस्टर की डिग्री हासिल की। लेकिन डिग्री पाना और सफल वकील बनना अलग बात थी। वापस भारत आने पर उन्हें एहसास हुआ कि व्यावहारिक कानूनी ज्ञान की कमी है।

मुंबई में वकालत शुरू करने की कोशिश की, लेकिन पहले ही केस में अदालत में खड़े होकर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। यह उनके लिए बेहद शर्मनाक क्षण था। राजकोट वापस आकर छोटे-मोटे कानूनी काम करने पड़े।

आत्मविश्वास की कमी उनकी सबसे बड़ी समस्या थी। पब्लिक स्पीकिंग से डर लगता था और क्लाइंट्स के सामने अपनी बात रखने में कठिनाई होती थी। इसी दौरान दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी से दक्षिण अफ्रीका जाने का प्रस्ताव मिला।

यह प्रस्ताव उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। दक्षिण अफ्रीका जाने का फैसला केवल आर्थिक जरूरत से नहीं बल्कि अपने आत्मविश्वास को वापस पाने की चाह से भी प्रेरित था।

दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष और नेतृत्व की शुरुआत

कानूनी प्रैक्टिस और नस्लीय भेदभाव का सामना

1893 में जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका पहुंचे, तो उन्हें शायद ही पता था कि यह यात्रा उनके जीवन की दिशा ही बदल देगी। दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी के लिए कानूनी काम करने गए गांधी को पहले दिन से ही नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। प्रिटोरिया की यात्रा के दौरान ट्रेन से फेंके जाने की घटना ने उनकी आंखें खोल दीं। यह वह क्षण था जब गांधी को एहसास हुआ कि भारतीयों के साथ कितना अन्याय हो रहा था।

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को:

  • मताधिकार से वंचित रखा जाता था
  • £3 का वार्षिक कर देना पड़ता था
  • व्यापार करने में बाधाएं आती थीं
  • सामाजिक स्थानों पर प्रवेश की मनाही थी

गांधी की कानूनी प्रैक्टिस धीरे-धीरे सफल होने लगी, लेकिन उनका मन भारतीय समुदाय की दुर्दशा देखकर व्याकुल रहता था। वे समझ गए कि केवल व्यक्तिगत सफलता काफी नहीं है, बल्कि पूरे समुदाय के कल्याण के लिए काम करना जरूरी है।

सत्याग्रह आंदोलन की खोज और प्रयोग

दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने सत्याग्रह का सिद्धांत विकसित किया, जो बाद में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा बना। 1906 में ट्रांसवाल सरकार द्वारा भारतीयों के लिए लाया गया एशियाई पंजीकरण अधिनियम (ब्लैक एक्ट) इस आंदोलन की शुरुआत का कारण बना।

इस कानून की मुख्य शर्तें थीं:

  • सभी भारतीयों का अनिवार्य पंजीकरण
  • फिंगरप्रिंट देना आवश्यक
  • पंजीकरण प्रमाणपत्र हमेशा साथ रखना
  • नियमों का उल्लंघन करने पर जेल की सजा

गांधी जी ने इस कानून का अहिंसक विरोध करने का फैसला किया। उन्होंने “सत्याग्रह” शब्द गढ़ा, जिसका अर्थ था सत्य के लिए आग्रह। यह विरोध सिर्फ नकारात्मक नहीं था, बल्कि एक सकारात्मक शक्ति थी जो अन्याय के खिलाफ खड़ी होती थी।

पहला सत्याग्रह आंदोलन 1906 से 1914 तक चला। इस दौरान हजारों भारतीयों ने जेल की सजा भुगती, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

भारतीय समुदाय के अधिकारों की लड़ाई

गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों की लड़ाई को संगठित तरीके से लड़ा। उन्होंने 1894 में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की, जो दक्षिण अफ्रीका में पहला राजनीतिक संगठन था।

इस संगठन के मुख्य उद्देश्य थे:

  • भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव को उजागर करना
  • सरकार के सामने उनकी समस्याएं रखना
  • समुदाय में एकजुटता लाना
  • कानूनी सहायता प्रदान करना

1913 का महान सत्याग्रह आंदोलन गांधी जी की नेतृत्व क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण था। जब सरकार ने घोषणा की कि केवल ईसाई धर्म में की गई शादियां ही मान्य होंगी, तो हजारों भारतीय महिलाओं ने आंदोलन में भाग लिया। कस्तूरबा गांधी भी इस आंदोलन की अगुआ थीं।

इस आंदोलन की सफलता:

  • £3 का वार्षिक कर समाप्त हो गया
  • भारतीय विवाहों को मान्यता मिली
  • प्रवासी मजदूरों की स्थिति में सुधार हुआ
  • जनरल स्मट्स के साथ समझौता हुआ

दक्षिण अफ्रीका में बिताए गए 21 साल गांधी जी के व्यक्तित्व निर्माण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थे। यहां उन्होंने न केवल अपने नेतृत्व कौशल को निखारा, बल्कि सत्याग्रह जैसे शक्तिशाल हथियार का आविष्कार भी किया।

स्वतंत्रता संग्राम में गांधी जी का योगदान

महात्मा गांधी
Biography of Mahatma Gandhi

असहयोग आंदोलन और जनजागरण

1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया जो भारत की आजादी की लड़ाई में एक अहम मोड़ साबित हुआ। जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत आंदोलन की पृष्ठभूमि में शुरू हुआ यह आंदोलन गांधी जी की अहिंसक प्रतिरोध की रणनीति का पहला बड़ा प्रयोग था। गांधी जी ने लोगों से कहा कि वे:

  • सरकारी नौकरियों से इस्तीफा दे दें
  • विदेशी कपड़ों और सामान का बहिष्कार करें
  • सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दें
  • कचहरियों और सरकारी कार्यक्रमों से दूर रहें

यह आंदोलन सिर्फ राजनीतिक नहीं था बल्कि एक सामाजिक क्रांति भी थी। चर्खा और खादी इस आंदोलन के प्रतीक बन गए। गांधी जी ने अपनी वकालत छोड़ी और अपनी जिंदगी को आजादी की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने उनका साथ दिया और जेल गए। यह आंदोलन 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद स्थगित हो गया, लेकिन इसने लाखों भारतीयों के मन में आजादी की आग जला दी।

नमक सत्याग्रह और दांडी यात्रा का महत्व

1930 की दांडी यात्रा गांधी जी के राजनीतिक करियर की सबसे चर्चित घटना मानी जाती है। नमक पर लगे टैक्स के खिलाफ गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील की पैदल यात्रा शुरू की। यह यात्रा 24 दिन चली और इसमें 78 स्वयंसेवक शामिल हुए।

6 अप्रैल को दांडी पहुंचकर गांधी जी ने समुद्र के किनारे नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। यह एक साधारण सा काम लगता था लेकिन इसका प्रभाव दुनियाभर में फैला। इस यात्रा की खासियतें:

  • सरल विरोध: आम आदमी भी समझ सकता था कि नमक पर टैक्स गलत है
  • मीडिया कवरेज: दुनिया भर की प्रेस ने इस यात्रा को कवर किया
  • जन भागीदारी: लाखों लोग सिविल नाफरमानी में शामिल हुए
  • अंतर्राष्ट्रीय ध्यान: गांधी जी विश्व के सामने एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभरे

इस सत्याग्रह के दौरान लगभग 60,000 लोग गिरफ्तार हुए। दांडी यात्रा ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी और अंग्रेजी सरकार को भारतीयों की एकजुटता का एहसास कराया।

भारत छोड़ो आंदोलन और अंग्रेजों के विरुद्ध अंतिम संघर्ष

9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने मुंबई में “भारत छोड़ो” आंदोलन का आह्वान किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शुरू हुआ यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जन आंदोलन था। गांधी जी ने “करो या मरो” का नारा दिया और भारतीयों से कहा कि वे अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दें।

आंदोलन की मुख्य विशेषताएं:

  • तत्काल गिरफ्तारी: गांधी जी समेत सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए
  • स्वतःस्फूर्त प्रतिरोध: नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन चलता रहा
  • व्यापक भागीदारी: छात्रों, महिलाओं, मजदूरों और किसानों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया
  • सरकारी दमन: अंग्रेजी सरकार ने कड़ी कार्रवाई की और हजारों लोग मारे गए

यह आंदोलन अंग्रेजों को साफ संदेश दे गया कि अब भारत में उनका शासन नहीं चल सकता। युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजी सरकार को समझ आ गया कि भारत को आजादी देने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

हिंद स्वराज और राजनीतिक दर्शन

1909 में लिखी गई “हिंद स्वराज” गांधी जी के राजनीतिक विचारों का आधार है। इस पुस्तक में उन्होंने स्पष्ट किया कि सिर्फ अंग्रेजों को भगाना काफी नहीं है, बल्कि एक नए समाज का निर्माण करना है। गांधी जी के राजनीतिक दर्शन के मुख्य सिद्धांत:

स्वराज का मतलब:

  • केवल राजनीतिक आजादी नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता
  • व्यक्तिगत और सामूहिक स्वतंत्रता
  • नैतिक और आध्यात्मिक विकास

सर्वोदय समाज:

  • सबका कल्याण और समान विकास
  • छोटे उद्योगों और कुटीर धंधों को बढ़ावा
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर जोर

महात्मा गांधी जी का मानना था कि पश्चिमी सभ्यता की अंधी नकल करने से भारत का भला नहीं होगा। उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो लेकिन आधुनिक भी हो। उनका राजनीतिक दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस वक्त था।

गांधी जी के जीवन दर्शन और सिद्धांत

अहिंसा और सत्य के प्रयोग

महात्मा गांधी का जीवन दर्शन मुख्यतः अहिंसा और सत्य के दो स्तंभों पर खड़ा था। उनके लिए अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा न करना नहीं था, बल्कि यह मन, वचन और कर्म से पूर्ण शुद्धता का मार्ग था। गांधी जी का मानना था कि अहिंसा सबसे बड़ी शक्ति है और यह कमजोरी का नहीं बल्कि अपार साहस का प्रतीक है।

सत्याग्रह उनका सबसे महत्वपूर्ण हथियार था। उन्होंने सत्य को ईश्वर माना और कहा कि सत्य की खोज ही जीवन का लक्ष्य है। दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक, उन्होंने इन सिद्धांतों का व्यावहारिक प्रयोग किया। डांडी मार्च, खिलाफत आंदोलन, और असहयोग आंदोलन इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। गांधी जी की अहिंसा में शामिल थी:

  • विरोधी के प्रति भी प्रेम और करुणा
  • न्यायपूर्ण संघर्ष के लिए कष्ट सहने की तैयारी
  • हिंसक प्रतिक्रिया से बचना
  • आत्म-शुद्धीकरण की निरंतर प्रक्रिया

सर्वोदय और ग्राम स्वराज की अवधारणा

गांधी जी का सर्वोदय सिद्धांत समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के कल्याण पर केंद्रित था। उनका मानना था कि सच्चा लोकतंत्र तभी आ सकता है जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी खुशहाल हो। यह विचार उनके “सबका साथ, सबका विकास” के मूल सिद्धांत को दर्शाता है।

ग्राम स्वराज गांधी जी के राजनीतिक दर्शन का केंद्र था। उनकी दृष्टि में भारत की आत्मा गांवों में बसती है। वे चाहते थे कि प्रत्येक गांव आत्मनिर्भर हो और अपने मामलों का फैसला खुद करे। ग्राम स्वराज की मुख्य विशेषताएं थीं:

  • स्थानीय स्वशासन और निर्णय लेने की शक्ति
  • आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन
  • पारंपरिक कुटीर उद्योगों का विकास
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय की व्यवस्था
  • सामुदायिक एकता और सहयोग

गांधी जी का मानना था कि केंद्रीकृत सत्ता व्यक्ति को कमजोर बनाती है। इसलिए वे विकेंद्रीकरण के समर्थक थे।

धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव

गांधी जी की धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से बिल्कुल अलग थी। वे धर्म को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन से अलग नहीं मानते थे। उनके लिए धर्म जीवन जीने की पद्धति था, न कि केवल पूजा-पाठ का मामला। सर्वधर्म समभाव उनके जीवन का मूलमंत्र था।

गांधी जी नियमित रूप से विभिन्न धर्मों का अध्ययन करते थे। भगवद्गीता के साथ-साथ वे कुरान, बाइबिल और अन्य धर्मग्रंथों से प्रेरणा लेते थे। उनकी प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों के भजन और प्रार्थनाएं शामिल होती थीं।

उनका कहना था कि सभी धर्म अपने मूल में एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। इस दृष्टिकोण की विशेषताएं थीं:

  • सभी धर्मों का समान सम्मान
  • धार्मिक कट्टरता का विरोध
  • धर्म के नाम पर हिंसा की मजबूत निंदा
  • आध्यात्मिकता को जीवन के हर पहलू में शामिल करना

आर्थिक न्याय और स्वदेशी का महत्व

गांधी जी का आर्थिक चिंतन न्याय और समानता पर आधारित था। वे पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की कमियों को समझते थे। उनका “ट्रस्टीशिप” का सिद्धांत एक मध्यम मार्ग था, जिसमें धनी लोगों को समाज के कल्याण के लिए अपनी संपत्ति का उपयोग करना था।

स्वदेशी गांधी जी के लिए केवल आर्थिक रणनीति नहीं थी, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का मामला था। उनका मानना था कि स्थानीय उत्पादन और उपभोग से न केवल आर्थिक स्वतंत्रता मिलती है, बल्कि सामुदायिक एकता भी मजबूत होती है।

चरखा और खादी इसके प्रतीक बने। स्वदेशी आंदोलन की मुख्य बातें थीं:

  • स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता
  • विदेशी सामान का बहिष्कार
  • कुटीर उद्योगों का संरक्षण और विकास
  • श्रम की गरिमा और महत्व
  • आर्थिक आत्मनिर्भरता के जरिए राजनीतिक स्वतंत्रता

महात्मा गांधी जी का मानना था कि आर्थिक न्याय के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि विकास की प्रक्रिया में सबसे गरीब व्यक्ति का फायदा सबसे पहले होना चाहिए।

व्यक्तिगत जीवन और रोचक तथ्य

महात्मा गांधी
महात्मा गांधी की जीवनी

सादगी भरी जीवनशैली और दैनिक दिनचर्या

गांधी जी की सादगी देखकर कोई भी हैरान रह जाता था। वे दुनिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे, लेकिन उनका जीवन बिल्कुल सामान्य व्यक्ति की तरह था। रोज सुबह 4 बजे उठना, प्रार्थना करना, और फिर दिन भर की गतिविधियों की शुरुआत करना – यह था उनका रूटीन।

खाने-पीने के मामले में वे बेहद सख्त नियम फॉलो करते थे। बकरी का दूध, फल, सूखे मेवे और हरी सब्जियां – बस यही था उनका भोजन। मांस, मछली और अंडे से वे पूरी तरह दूर रहते थे। कपड़ों के नाम पर सिर्फ खादी की धोती और चादर, जिसे वे खुद चरखे से बनाते थे।

उनका आश्रम जीवन भी अनोखा था। हर व्यक्ति को बराबर काम करना पड़ता था – चाहे वह सफाई हो, खाना बनाना हो या खेती का काम। गांधी जी खुद शौचालय साफ करते थे, जो उस जमाने में बहुत बड़ी बात थी।

आत्मकथा और लेखन कार्य

गांधी जी सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि एक बेहतरीन लेखक भी थे। उनकी प्रसिद्ध आत्मकथा “सत्य के प्रयोग” आज भी दुनिया भर में पढ़ी जाती है। इस किताब में उन्होंने अपनी हर गलती को खुले दिल से स्वीकार किया है।

“हरिजन”, “यंग इंडिया” और “नवजीवन” जैसी पत्रिकाओं के जरिए वे अपने विचार आम लोगों तक पहुंचाते रहे। उन्होंने 100 से ज्यादा किताबें लिखीं और हजारों लेख प्रकाशित किए। गीता पर उनकी टीका भी काफी मशहूर है।

उनकी लेखनी में सादगी थी, लेकिन गहराई भी। जटिल से जटिल विषय को वे इतनी आसान भाषा में समझाते थे कि एक सामान्य व्यक्ति भी उसे समझ सकता था। हर रोज डायरी लिखना उनकी आदत थी, जिससे उनके विचारों का पूरा रिकॉर्ड मिल जाता है।

अनोखी आदतें और व्यक्तित्व की विशेषताएं

गांधी जी की कुछ आदतें वाकई अनोखी थीं। वे हमेशा अपने साथ एक छोटा बंदर रखते थे – नाम था हनुमान। यह बंदर उनके कंधे पर बैठा रहता था और बैठकों में भी साथ होता था।

उनकी सुनने की शक्ति कमाल की थी। वे एक साथ कई लोगों की बात सुन सकते थे और हर किसी को सही जवाब दे देते थे। चरखा चलाते समय भी वे लोगों से मिलते रहते थे।

सफर के दौरान वे ट्रेन में तीसरे दर्जे में ही यात्रा करते थे। कहते थे कि जब तक भारत का आखिरी व्यक्ति तीसरे दर्जे में सफर करता रहेगा, तब तक वे भी यही करेंगे। अपनी चप्पल खुद बनाते थे और घड़ी हमेशा सही समय दिखाती थी।

मौन रहना उनकी खास आदत थी। हफ्ते में एक दिन वे बिल्कुल चुप रहते थे और लिखकर बात करते थे। कहते थे कि मौन से मन को शांति मिलती है और सोचने की शक्ति बढ़ती है।

Conclusion

गांधी जी का जीवन एक साधारण गुजराती परिवार से शुरू होकर विश्व के महानतम नेताओं में से एक बनने की अनूठी कहानी है। उनकी शिक्षा यात्रा, दक्षिण अफ्रीका में मिले अनुभव, और भारत की आजादी के लिए किए गए अहिंसक संघर्ष ने उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा दिलाया। उनके सत्य, अहिंसा और सादगी के सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे।

गांधी जी की जिंदगी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चाई और दृढ़ता के साथ कोई भी व्यक्ति बड़े से बड़े बदलाव ला सकता है। आज के समय में जब दुनिया में हिंसा और अशांति बढ़ रही है, तब गांधी जी के विचार और उनके जीवन मूल्य हमारे लिए प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। उनके आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में अपनाकर हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *